इतिहास · अतिशय · गौ-सेवा

इतिहास, अतिशय एवं श्री विद्यासागर गौशाला

इतिहास

भव्य जिनालय की गाथा

भौतिकता की भाग-दौड़ से दूर, आध्यात्मिक शांति के सुरम्य वातावरण और नैसर्गिक सुषमा से युक्त प्रकृति की गोद में, सर उठाए वीतरागता का संदेश देती भगवान शांतिनाथ की 22.5 फीट उत्तुंग खड्गासन मूर्ति और भगवान पार्श्वनाथ तथा सुपार्श्वनाथ की फणावली से युक्त 8-8 फीट ऊंची मूर्तियों से सुशोभित यह प्राचीन भव्य जिनालय एक समतल स्थान पर बना हुआ है। मंदिर की सभी मूर्तियां लाल बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। लगभग एक हजार वर्षों के पश्चात भी उनकी मौलिक पॉलिश और चमक मन को मोह लेती है।

मूलनायक की मूर्ति के दोनों ओर दीवार से सटकर बनायी गयी नयी पत्थर की सीढ़ियां हैं, जो अभिषेक हेतु भगवान के शिरोभाग तक पहुंचती हैं। मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा पादमूल में अंकित प्रशस्ति लेख के अनुसार ई. सन् 1100–1101 में "राजाधिराज परमरेश्वर भोज देव" के काल में हुई — परमार वंश के इसी प्रसिद्ध राजा भोज के निर्देशानुसार यह प्रतिष्ठा संपन्न हुई थी।

भगवान शांतिनाथ पुराणों में वर्णित 63 शलाका पुरुषों में तीर्थंकर, चक्रवर्ती और कामदेव — तीनों पद धारण करने वाले महापुरुष माने जाते हैं, ऐसा शुभ संयोग कोटि जन्मों की तपस्या से ही प्राप्त होता है।

भोजपुर का यह भव्य जिनालय भक्तों और भक्तामर स्तोत्र के आराधकों को भाव सहित वंदना के लिए सतत आमंत्रण देता हुआ प्रतीत होता है। मंदिर प्रांगण में ही आचार्य मानतुंगाचार्य की समाधि बनी है, तथा मंदिर के बायीं ओर चिंताहरण सिद्ध शिला स्थित है, जिस पर मानतुंगाचार्य और उनके आराध्य भगवान ऋषभदेव की केशराशि-युक्त प्रतिमाएं विद्यमान हैं।

निर्माण-काल एवं प्रशस्ति लेख का विवरण क्षेत्र समिति के ऐतिहासिक अभिलेखों पर आधारित है।

मंदिर प्रांगण — प्लेसहोल्डर, कृपया वास्तविक फोटो से बदलें
अतिशय एवं चमत्कार

अतिशय और प्रत्यक्ष चमत्कार

ऊपर वर्णित सिद्ध शिला पर उकेरी गई मूर्तियों के प्रकाश में आने की भी एक रोचक कथा है, जो स्वयं में एक अतिशय है। सैकड़ों वर्षों से उपेक्षित पड़ी सिद्ध शिला के संबंध में मंदिर के तत्कालीन पुजारी ने स्वप्न में देखा कि वह सिद्ध शिला की भी पूजा कर रहे हैं। प्रातः मंदिर में नित्य नियम पूजा-अभिषेक के पश्चात जब उनका अवचेतन मस्तिष्क उसे सिद्ध शिला के पास ले गया, तब स्वप्न में हुई बातें स्मरण आने लगीं। ध्यानपूर्वक खोजबीन करने पर उस स्थान पर लगभग दो सेंटीमीटर गहरी दो मूर्तियों के दर्शन हुए, जैसा कि ऊपर बताया गया है — एक मूर्ति केशी भगवान ऋषभदेव की और दूसरी अध्ययनरत मुनि के पीछे कमंडलयुक्त मूर्ति, जो मानतुंगाचार्य और सिद्धशिला से सप्रमाण संबंध स्थापित करती है।

श्री मंदिरजी का नवीन प्रवेश द्वार — प्लेसहोल्डर, कृपया वास्तविक फोटो से बदलें
चरणों में चांदी नाग — प्लेसहोल्डर, कृपया वास्तविक फोटो से बदलें

1008 भगवान शांतिनाथ और उनके पार्श्व में स्थित भगवान पार्श्वनाथ व सुपार्श्वनाथ की फणावलियों सहित मनोज्ञ मूर्तियां विगत ग्यारहवीं शताब्दी से विश्व-शांति और कल्याणकारी ऊर्जा का प्रसार करती आ रही हैं, अपने अध्यात्मिक तथा मूर्तिगत शिल्प के चमत्कार से भक्तजनों और जनसामान्य को चमत्कृत करती हुई। अनेक भक्तों को मंदिर के गर्भगृह से आज भी कभी-कभी रात्रि के सन्नाटे में मधुर वाद्यों की गूंज और समवेत भक्ति के स्वर सुनाई देते हैं, मानो देव-किन्नर गंधर्व स्वयं भगवान की पूजा-अर्चना कर रहे हों।

दिनांक 14 नवंबर 2003 को लगभग 6.5 फीट लंबे काले रंग के सुदृढ़ कोबरा नागराज अनजाने ही भगवान शांतिनाथ के चरणों में आ पहुंचे और पूरे पंद्रह दिनों तक वहीं भक्तिभाव में लीन रहे। इतने अहिंसक भाव से रहे कि चूहों ने उनके शरीर पर दो स्थानों पर काट खाया, फिर भी उन्होंने वह पीड़ा सहज ही सह ली। प्रभु-चरणों के इस चमत्कार से क्षमाशील नागराज स्वयं ही अंतर्धान हो गए, बिना किसी को हानि पहुंचाए। इस चमत्कारी घटना को लगभग एक हजार भक्तों ने अपनी आंखों से देखा, और समाचार-पत्रों तथा टी.वी. चैनलों ने भी इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया।

क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल है।
गौ-सेवा

श्री विद्यासागर गौशाला

विगत वर्षों से क्षेत्र के आसपास के निवासियों द्वारा अपने वृद्ध गोवंश एवं दुधारू पशुओं को, पथरीले क्षेत्र में हरी घास व भूसे के अभाव में उचित पालन-पोषण न कर पाने की स्थिति समाज के समक्ष रखी गई थी। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1998 में आचार्यश्री 108 विद्यासागरजी महाराज के आशीर्वाद तथा उनके शिष्य मुनिश्री 108 नियमसागरजी महाराज के सान्निध्य में, क्षेत्र पर गौ-संरक्षण की भावना से प्रेरित होकर श्री विद्यासागर गौशाला की स्थापना की गई।

राज्य शासन द्वारा गठित मध्यप्रदेश गौ सेवा आयोग द्वारा गौशाला को निरंतर मार्गदर्शन एवं सहयोग प्राप्त होता रहता है। आज यह गौशाला क्षेत्र की गौ-सेवा भावना का जीवंत प्रतीक बनकर वृद्ध एवं असहाय गोवंश को सुरक्षित आश्रय प्रदान कर रही है।

1998 स्थापना वर्ष
300+ संरक्षित गोवंश (वर्तमान में)
म.प्र. गौ सेवा आयोग का सहयोग
श्री विद्यासागर गौशाला — प्लेसहोल्डर, कृपया वास्तविक फोटो से बदलें
श्री विद्यासागर गौशाला, क्षेत्र परिसर

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